जनतंत्र का गणित

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संभावनाओं की रेखायें…
उम्मीदों के क्षितिज पे धुंधली क्यूँ पड़
जाती हैं…
जनतंत्र का जीवन गणित समझने- समझाने में
पार्टियों की मस्तिस्क रेखायें शिथिल क्यूँ पड़
जाती हैं .!
अभी कल ही कॉंग्रेस
की इंसानियत वाले सेमिनार में
” आम-आदमी ” का हृदय सिसक उठा
भगवा – हरा आंतकवाद का भेद समझने- समझाने में..!
संभावनाओं की रेखायें…
उम्मीदों के क्षितिज पे धुंधली क्यूँ पड़
जाती हैं…
रो उठी आत्मा गाँधी और भगत
की ..
भारत-माता ललकार उठी
हाँ – हाँ रंग दे मुझे ,
भगवा- हरे के विषरूपी इन्द्रधनुष में …!
संभावनाओं की रेखायें…
उम्मीदों के क्षितिज पे धुंधली क्यूँ पड़
जाती हैं…

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