नचारी

शिव कुमार झा टिल्लू
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हिमक शैलपर अपने बैसल
तखन कोना जग तप्त
हे शिव ! मनुखक हियमे उसनल तृष्णा
भक्ति भेलै अभिशप्त !
भरने छह तों कंठ हलाहल
उगलि रहल छै लोक
तांडव मानव क’ रहलै ये’
नहि छै कोनो शोक
दानकबल संग दया के’ सम्बल
करह जटाजल सिक्त
हे शिव ! मनुखक हियमे उसनल तृष्णा
भक्ति भेलै अभिशप्त !
कंठ जारि नीलकंठ कहेलह
जग होइते निष्प्राण
दीनक हाल तोरा छह बुझले
समरथ -भौतिक तान
चानक अंश उधारक शीतल
सुरुजक देह प्रदीप्त
हे शिव ! मनुखक हियमे उसनल तृष्णा
भक्ति भेलै अभिशप्त !
ज्ञानी बुड़िबक गोंग बनल छै
अधमकेँ वाकक श्रृंग
जे माली बनि सुमन संवारल
ओकरे काटल भृंग
भाव सिनेह साध्यक सांगहतर
साधक धएल विरक्त
हे शिव ! मनुखक हियमे उसनल तृष्णा
भक्ति भेलै अभिशप्त !

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